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NISM - 8 Equity Derivatives Exam 2024 | FULL COURSE - Chapter 3 Part - A

Summary

यह वीडियो फॉरवर्ड और फ्यूचर कांट्रैक्ट्स के बुनियादी सिद्धांतों और उनके व्यावहारिक अनुप्रयोगों का गहन परिचय देता है। इसमें बताया गया है कि फॉरवर्ड कांट्रैक्ट्स कस्टमाइज्ड द्विपक्षीय समझौते हैं जिनमें काउंटरपार्टी और लिक्विडिटी रिस्क होती है। इसके विपरीत, फ्यूचर्स स्टैंडर्डाइज्ड और एक्सचेंज-ट्रेडेड होते हैं, जो मार्जिन और डेली सेटलमेंट (M2M) के माध्यम से रिस्क कम करते हैं। वीडियो में बेसिस, कॉस्ट ऑफ कैरी और कांट्रैक्ट साइकिल जैसे महत्वपूर्ण शब्दों को रियल-टाइम मार्केट डेटा और ट्रेडिंग स्क्रीन के उदाहरणों के साथ समझाया गया है, जो डेरिवेटिव मार्केट की जटिलताओं को सरल बनाता है।

Key Insights

फॉरवर्ड और फ्यूचर कांट्रैक्ट्स के बीच का बुनियादी अंतर रिस्क मैनेजमेंट और स्टैंडर्डाइजेशन में निहित है।

फॉरवर्ड कांट्रैक्ट्स दो पार्टियों के बीच अत्यधिक कस्टमाइज्ड होते हैं, जिससे उनमें लिक्विडिटी की कमी होती है और काउंटरपार्टी के मुकरने का जोखिम अधिक होता है। फ्यूचर्स इन समस्याओं को स्टैंडर्डाइजेशन के जरिए हल करते हैं, जहां हर कांट्रैक्ट का साइज, क्वालिटी और एक्सपायरी पहले से तय होती है। फ्यूचर्स एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं, जिसका अर्थ है कि खरीदार और विक्रेता एक-दूसरे को नहीं जानते, और एक्सचेंज गारंटी देता है कि सौदे पूरे होंगे, जिससे काउंटरपार्टी रिस्क समाप्त हो जाती है।

कॉस्ट ऑफ कैरी (Cost of Carry) फ्यूचर और स्पॉट प्राइस के बीच के संबंध और अंतर को निर्धारित करता है।

कॉस्ट ऑफ कैरी वह अतिरिक्त लागत है जो किसी एसेट को भविष्य तक होल्ड करने में लगती है। इसमें बैंक लोन पर ब्याज, वेयरहाउस स्टोरेज शुल्क, इंश्योरेंस और डिलीवरी की लागत शामिल होती है। जब हम आज के स्पॉट प्राइस और भविष्य के कांट्रैक्ट प्राइस के बीच अंतर (बेसिस) देखते हैं, तो वह मुख्य रूप से इसी कॉस्ट ऑफ कैरी की वजह से होता है। उदाहरण के लिए, यदि आप आज कॉपर खरीदते हैं और उसे सितंबर तक रखना चाहते हैं, तो बैंक ब्याज और वेयरहाउस चार्ज मिलकर सितंबर फ्यूचर के प्राइस को आज के स्पॉट प्राइस से ऊपर ले जाएंगे।

मार्क-टू-मार्केट (M2M) और डेली सेटलमेंट फ्यूचर्स ट्रेडिंग की सबसे महत्वपूर्ण संचालन प्रक्रिया है।

फ्यूचर्स में प्रॉफिट या लॉस सिर्फ कांट्रैक्ट खत्म होने पर नहीं बल्कि हर रोज सेटल किया जाता है। इसे मार्क-टू-मार्केट (M2M) कहते हैं। ट्रेडिंग डे के अंत में, यदि मार्केट प्राइस आपके ट्रेड के खिलाफ जाता है, तो ब्रोकर आपके अकाउंट से तुरंत वह पैसा काट लेता है और इसे फेवर में जाने वाली पार्टी के पास ट्रांसफर कर दिया जाता है। यदि आप डेली लॉस को कवर करने के लिए पर्याप्त मार्जिन नहीं रखते हैं, तो एक्सचेंज आपकी पोजीशन क्लोज कर सकता है। यह प्रक्रिया बाजार में डिफॉल्ट के जोखिम को रोकने के लिए बनाई गई है।

Sections

फॉरवर्ड कांट्रैक्ट की विशेषताएं और सीमाएं

फॉरवर्ड कांट्रैक्ट एक द्विपक्षीय समझौता है जहां शर्तें आज ही तय कर ली जाती हैं।

फॉरवर्ड कांट्रैक्ट को एक 'शर्त' के रूप में समझा जा सकता है जो दो पार्टियों के बीच होती है। इसमें क्वांटिटी, डिलीवरी की तारीख, सेटलमेंट की विधि और प्राइस आज ही फ्रीज कर दिए जाते हैं, लेकिन इनका निष्पादन भविष्य की एक निश्चित तारीख को होता है। यह पूरी तरह से कस्टमाइज्ड होता है और दोनों पार्टियों का दायित्व है कि वे शर्तों को पूरा करें।

फॉरवर्ड्स में काउंटरपार्टी रिस्क और लिक्विडिटी रिस्क सबसे बड़ी चुनौतियां होती हैं।

चूंकि यह निजी समझौता है, यदि एक पार्टी ने हाथ खड़े कर दिए (डिफ़ॉल्ट), तो दूसरी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अलावा, अत्यधिक कस्टमाइजेशन के कारण इन कांट्रैक्ट्स को एक्सपायरी से पहले बाजार में किसी और को बेचना लगभग असंभव होता है, जिसे लिक्विडिटी रिस्क कहा जाता है।


फ्यूचर कांट्रैक्ट्स और एक्सचेंज ट्रेडिंग

फ्यूचर कांट्रैक्ट्स सेंट्रलाइज्ड ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (जैसे NSE/BSE) के माध्यम से काम करते हैं।

व्यापारी सीधे एक-दूसरे से सौदा नहीं करते, बल्कि एक्सचेंज के जरिए करते हैं। ब्रोकर केवल एक यूजर इंटरफेस प्रदान करते हैं, जबकि मुख्य ट्रेडिंग और प्राइस डिस्कवरी एक्सचेंज के प्लेटफॉर्म पर होती है। यह निवेशकों को गुमनामी प्रदान करता है और सौदे के निष्पादन की गारंटी देता है।

प्राइस डिस्कवरी और मार्जिन की आवश्यकता फ्यूचर्स की प्रमुख विशेषताएं हैं।

फ्यूचर्स में प्राइस डिस्कवरी खरीदारों और विक्रेताओं के बीच बोलियों (Bids) के माध्यम से होती है। काउंटरपार्टी रिस्क को नेगेट करने के लिए एक्सचेंज दोनों पार्टियों (खरीदार और विक्रेता) से मार्जिन जमा करवाता है। यह मार्जिन एसेट की कुल वैल्यू का एक छोटा हिस्सा होता है जो डिफॉल्ट की स्थिति में सुरक्षा कवच का काम करता है।

क्वालिटी और क्वांटिटी का मानकीकरण फ्यूचर्स को ट्रेडेबल बनाता है।

फ्यूचर्स में आप अपनी मर्जी से क्वांटिटी (जैसे 1601 शेयर) नहीं खरीद सकते; आपको एक्सचेंज द्वारा निर्धारित 'लॉट साइज' (जैसे 1600 शेयर) में ही ट्रेड करना होगा। इसी तरह कमोडिटीज जैसे गोल्ड में क्वालिटी (24 कैरेट बनाम 18 कैरेट) और मात्रा (1 ग्राम बनाम 1 किलो) पहले से तय होती है, जिससे ट्रेडिंग आसान हो जाती है।


कांट्रैक्ट स्पेसिफिकेशन और साइकिल

फ्यूचर कांट्रैक्ट की अवधि और एक्सपायरी की तारीख निश्चित होती है।

भारत में स्टॉक फ्यूचर्स आमतौर पर तीन महीने की साइकिल (Near, Next, Far Month) में उपलब्ध होते हैं। हर कांट्रैक्ट महीने के अंतिम गुरुवार को एक्सपायर हो जाता है। एक्सपायरी के बाद उस पुराने कांट्रैक्ट में ट्रेडिंग बंद हो जाती है और एक नया 'Far Month' कांट्रैक्ट शुरू हो जाता है।

फिजिकल डिलीवरी और रोलओवर के नियमों को समझना अनिवार्य है।

यदि आप एक्सपायरी के दिन तक अपनी पोजीशन नहीं काटते हैं, तो आपको उन शेयरों की पूरी डिलीवरी लेनी होगी। इसके लिए आपको स्टॉक की पूरी वैल्यू का भुगतान करना होगा। यदि आप डिलीवरी नहीं चाहते लेकिन पोजीशन जारी रखना चाहते हैं, तो आपको पुराना कांट्रैक्ट बेचकर अगले महीने का कांट्रैक्ट खरीदना होगा, जिसे 'रोलओवर' कहते हैं।

टिक साइज और ट्रेडिंग टर्नओवर मार्केट की गहराई को दर्शाते हैं।

टिक साइज वह न्यूनतम मूल्य परिवर्तन है जो एक स्टॉक दिखा सकता है (जैसे 0.05 पैसे)। टर्नओवर और ट्रेडेड कांट्रैक्ट्स की संख्या यह बताती है कि उस विशेष इंस्ट्रूमेंट में कितनी लिक्विडिटी है। कमोडिटी ट्रेडिंग में टिक साइज और एमआरएफ जैसे महंगे शेयरों के लॉट साइज काफी अलग हो सकते हैं।


महत्वपूर्ण शब्दावली: बेसिस, मार्जिन और M2M

बेसिस (Basis) स्पॉट प्राइस और फ्यूचर प्राइस के बीच के अंतर को दर्शाता है।

बेसिस को कभी अकेले नहीं देखा जाता, बल्कि हमेशा समय (महीने) के संदर्भ में देखा जाता है। एक्सपायरी जितनी दूर होती है, बेसिस (स्प्रेड) उतना ही बड़ा होता है। जैसे-जैसे एक्सपायरी करीब आती है, बेसिस धीरे-धीरे कम होकर शून्य की ओर बढ़ता है, क्योंकि अंत में फ्यूचर और स्पॉट का क्लोजिंग प्राइस एक ही होना है।

इनिशियल मार्जिन और कोलेटरल के माध्यम से ट्रेडिंग संभव होती है।

ट्रेड शुरू करने के लिए जो पैसा अकाउंट में होना चाहिए, उसे इनिशियल मार्जिन कहते हैं। यह कैश में हो सकता है या आप अपने पास रखे शेयरों को गिरवी रखकर (Pledge) कोलेटरल मार्जिन भी प्राप्त कर सकते हैं। एक्सचेंज इसके माध्यम से यह सुनिश्चित करता है कि आपके पास संभावित नुकसान सहने की क्षमता है।

मार्क-टू-मार्केट (M2M) सेटलमेंट हर दिन खाते के बैलेंस को अपडेट करता है।

M2M प्रक्रिया के तहत, हर दिन दोपहर 3:30 बजे बाजार बंद होने के बाद, फाइनल सेटलमेंट प्राइस के आधार पर आपके लाभ या हानि की गणना की जाती है। यदि आपको घाटा हुआ है, तो वह पैसा आपके अकाउंट से तुरंत कम कर दिया जाता है, भले ही आपने पोजीशन न बेची हो। यह अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी है।


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